Friday, September 24, 2021
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वायरस पर विजय: इस परिवार ने अपने काम्प्लेक्स द्वारा समाज से बाहर निकाले जाने के बाद भी कोविड पर विजय हासिल की

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भारत में कोविड की स्थिति अब सामान्य है। दुख की बात है कि हम अपने आस-पास होने वाली मौतों और अस्पतालों के सामने की लाइन को देखने के आदी हो गए हैं। कोलकाता का यह परिवार, जिसने गुमनाम रहना चुना, ने जून 2020 के दौरान यह लड़ाई लड़ी थी।

उनकी तरह का पहला

भारतीय, अपने मेहमानों की जितनी स्वागत करते हैं, मुसीबत पड़ने पर अपनों का साथ भी छोड़ देते है। यह परिस्थितियों की तीव्र गलतफहमी और उनके जीवन खोने के भय से उपजता है।

यह परिवार, जिसमे पिता, माता, पिता का भाई (चाचा), कथावाचक, उसके भाई और भाभी और उसके चचेरे भाई है, अपने काम्प्लेक्स में संक्रमित होने वाले पहले लोग थे।

चूँकि किसी भी मामले की कोई पूर्ववर्ती स्थिति नहीं थी, इस परिवार ने, पूरी तरह से अंजान होने के कारण, समाज में अपने संपर्कों से मदद मांगी।

यह उनकी पहली गलती थी, क्योंकि उन्हें उनके पड़ोसी द्वारा परेशान किया गया, लगातार निगरानी की गई और यहां तक ​​कि ऐसे कठिन समय में उनकी गोपनीयता को भी भंग किया गया। मदद करने से ज्यादा, वे पूरी तरह से उपद्रव थे और परिवार के प्रति सोशल मीडिया पर बहुत असभ्य थे।

प्रसार को रोकने के लिए क्षेत्रीय नियंत्रण क्षेत्र बनाए गए थे

“सुरक्षा गार्ड किराने का सामान हमारे अपार्टमेंट में नहीं जाने देते थे, पड़ोसी चिंतित थे और हालांकि उनमें से अधिकांश हमारे चेहरे को नहीं देखना चाहते थे और हमारे साथ अछूतों की तरह व्यवहार करते थे, उनमें से कुछ ने हमें दवाइयाँ दीं और हमारी मदद की,” कहते हैं कथावाचक, एक 18 वर्षीय कॉलेज छात्र।

कुछ लड़ाइयां जीती गई और कुछ हारी गई

17 जून को, कथावाचक के पिता खतरे से बाहर थे और उन्हें आईसीयू से एक सामान्य बिस्तर पर स्थानांतरित किया गया। एक बार के लिए, उसने राहत की सांस ली और पूरी रात जागकर सजती-सवरती रही, क्योंकि उसे अच्छा लग रहा था।


Also Read: वायरस पर विजय: ‘कैसे मेरा पूरा परिवार और मैं अस्पताल में भर्ती हुए बिना ठीक हो गए’


18 तारीख को खबर आई कि उनके पैतृक चाचा का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया, जिसने उनके घर की स्तिथि को मायूस कर दी थी। सौभाग्य से, उन्हें अंतिम अनुष्ठानों के लिए उन्हें देखने की अनुमति दी गई थी। उसके पिता को बाद में खबर मिली जब वह थोड़ा बेहतर हुए और वे बेहद उदास हुए।

चूँकि उसके घर में हर कोई प्रभावित था, इसलिए घर के काम करने का श्रेय उसके ऊपर पड़ा क्योंकि वह एक मात्र व्यक्ति थी जो विषमलैंगिक थी। ओवरवर्क होने के कारण, उसे हल्का बुखार था, लेकिन उसने उस पर काबू पा लिया और उसे संभाल लिया और इस कठिन समय से लड़ी।

उत्पीड़न और अस्पताल में भर्ती और संगरोध के साथ, यह उन सभी के लिए एक कठिन महीना था, लेकिन आखिरकार, मुझे खुशी है कि मैं इसे वायरस पर विजय एपिसोड के रूप में लिख सकता हूं।

शहर के चारों ओर प्रतिबंध जो लॉकडाउन के तहत था

हमें जिन प्रमुख बिंदुओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है, वह यह तथ्य है कि कोविड-19 के रोगियों को समाज से बाहर निकालना वास्तव में बहुत गलत है। हमें एक राष्ट्र के रूप में आगे आने और जरूरतमंद लोगों की मदद करने की जरूरत है। अब वक्र लगभग व्हाई- अक्ष की ओर चपटा हो चूका है, हमें इससे एक साथ लड़ने की आवश्यकता है। सभी की अंधाधुंध मदद करें। हम मशीनरी को ढहने नहीं दे सकते, बल्कि इसे सुदृढ़ कर सकते हैं और एक बेहतर और अधिक लचीले स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली का निर्माण कर सकते हैं।


Image Sources: Google Images

Sources: Author’s Informant

Originally written in English by: Shouvonik Bose

Translated in Hindi by: @DamaniPragya

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Pragya Damanihttps://edtimes.in/
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